संस्कार भारती उझानी इकाई द्वारा वृहद काव्य संध्या
काव्य पुत्र तो मरकर भी इस दुनिया में, गीत गजल छंदों में जिंदा रहते हैं
उझानी – संस्कार भारती इकाई उझानी द्वारा वृहद काव्य संध्या का आयोजन जी एस हास्पिटल हाल में किया गया। काव्य संध्या की अध्यक्षता कवि कामेश पाठक ने की । मुख्य अतिथि डा गीतम सिंह ने मां वीणापाणि के समक्ष दीप प्रज्जवलित करके पुष्प अर्पित किए । काव्य संध्या का शुभारंभ कवि षट्वदन शंखधार की सरस्वती वंदना से हुआ ।
गीतकार डा. गीतम सिंह ने पढ़ा
मांटी की सोंदी सी खुशबू,मां के आंचल की छांव रे।
जाने कहां खो गया मेरा, वो बचपन वाला गांव रे।।
ओज कवि कामेश पाठक ने पढ़ा
खतरों से खेला हूँ, मेरा वेग कभी ठहरा नहीं है.
भारत का संबिधान हूँ,मुझे किसी से कोई खतरा नहीं है
हास्य ब्यंग्य कवि पवन शंखधार ने पढ़ा
जिसको समझ रहे तुम रुपया पैसा भी हो सकता है
कभी नहीं सोचा हो तुमने वैसा भी हो सकता है
उसकी मीठी बातें सुनकर तुम इतने आकर्षित क्यों
जिसको तुम हो भैंस समझते भैंसा भी हो सकता है
शायर उज्जवल वशिष्ठ ने गजल पढ़ी
जो भी मेरे कदम से ऊंचे हो गए
उन सभी के सख्त लहजे हो गए
ओज कवि षट्वदन शंखधार ने मुक्तक पढा
शब्दों के पर्वत हरगिज ना ढहते है
हम कब ये इतिहास के पन्ने कहते हैं
काव्य पुत्र तो मरकर भी इस दुनिया में
गीत गजल छंदों में जिंदा रहते हैं
राजवीर सिंह तरंग ने पढ़ा
घर-घर जाकर राग, सुनाती मोहन टोली।
जी भर खेलो फाग, आज आई है होली।।
प्रकृति वादी कवि जयवीर चंद्रवंशी ने पढ़ा
डिग्री लेकर फिर रहे, पढ़े लिखे हैं आज।
महंगाई के दौर में, मिले हाथ न काज।।
शैलेन्द्र घायल ने पढ़ा
तुम नई परिवेश में।
क्यों गए इस वेश में।।
पूछती आंखें सजल।
तुम गए किस देश में ।।
डा प्रभाकर मिश्र ने पढ़ा
ये हुजूर न उम्र पूछो इश्क करने वालों की।
मिज़ाजे आशिकी रखने वाले हमेशा जवां रहते हैं।
संजीव अमर ने पढ़ा
सदा हमारों ने हमको डांटा।
मगर कभी भी न प्यार बांटा।। चुकाते कब तक रहेंगे यारों। कभी तो होगा हमें भी घाटा।।
काव्य संध्या का संचालन उज्जवल वशिष्ठ ने किया। कार्यक्रम संयोजक डा विकास प्रजापति ने सभी कवियों को पटका ओढ़ाकर बैज लगाकर स्वागत किया। इस अवसर पर संस्कार भारती के सभी सदस्य पदाधिकारी मौजूद रहे ।
रिपोर्ट – पवन शंखधार